रविवार, 5 अक्तूबर 2008

परिवर्तन...

सब जानते हैं पर यकीन करना मुश्किल होता है कि चीजें इतनी तेजी से कैसे बदल जाती हैं। यादों के फीते से नापने पर तो ऐसा लगता है जैसे सब अभी-अभी ही तो चल रहा था___फासला इतना कैसे हो गया। ऐसा ही होता है._जिस रामलीला के आनंद सागर में बालमन और बालपन कुलांचें भर रहा था वो कब _लक्ष्मण से परशुराम की भूमिका में आ गया पता ही नहीं चला । _पिता के सामने जिस भूमिका में उनसे तकरार होती थी अब वही परसुराम की भूमिका स्वयं करने की चुनौती सामने आयी। _लक्ष्मण के रोल के बाद _ मेघनाथ ,परशुराम आदि की भूमिका रामलीला मई कीं._पिता जी के रोल होते थे _दशरथ ,परशुराम,बाली,अंगद ,सुतीक्षण आदि._वैसे तो रामलीला का चैलेन्ज कुछ एइसा होता है कि कब आपको क्या न बनना पड़ जाए_एक बार मुझे तो सूर्पनखा बनना पड़ा _हुआ ये कि जिसे सूर्पनखा बनना था पहले उन्हें मारीच बनना था और वो मारीच के रोल के लिए जोकरों वाले कपड़े पहनने की जिद कर रहे थे ,जिद पुरी नहीं हुई तो गोल हो गए._फ़िर क्या बने सूर्पनखा । _ लक्ष्मन आदि की भूमिका तो बड़े मासूम मन की होतीं हैं _चारो तरफ़ ...सौंदर्य,वैभव,आत्मीयता ,श्रद्धा का भावः होता है। एक लय जैसे होती है_आप अपने आप में नहीं होते ,आप जहाँ होते हैं ...जिस पात्र में होते हैं उसी में लीन होते हैं_ऐसे में कोई विचार ही नहीं उपजता _सर पर सोने का ताज हो ,राजाओं से लिबास और इतना सारा प्यार और सत्कार और क्या चाहिए .__सच जीवन मे इसके बाद और कुछ चाहने की जरुरत ही महसूस हुई ._सब कुछ चाहने पहले ही मिलता चला गया .

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