बुधवार, 21 जनवरी 2009
मंगलवार, 20 जनवरी 2009
अब क्या करेंगें जनाब !
सोमवार, 5 जनवरी 2009
लपेटे शाल कोहरे का...!
सुबह और शाम कोहरे का आलम है ...जन - जीवन , रहन - सहन , खान - पान ...सब बदला - बदला सा है _अजब - सी खुमारी है...अजब सा हाल है दिल - दिमाग का _
लपेटे शाल कोहरे का
दुबक कर सो रहा आकाश !
सातवें दशक के शुरुआती साल ... 'कादम्बिनी 'में प्रकाशित हुई थी यह कविता !... ' कादम्बिनी 'क्या !
एक जमाने में कोहरे को लेकर ये लाइनें _
मत कहो आकाश में कोहरा घना है !
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है !!
...भी खासी जुबान पर चढीं रहीं...और तरह - तरह लहजे और अर्थ देतीं रहीं _दुष्यंत कुमार का काव्य नए मुहावरे ढाल रहा था अपने दौर में ... !
अखबारों ...समाचारों ...में कोहरा सुर्खियों में है _एक वृतांत _
आइटीओ...बहादुरशाह जफ़र मार्ग ...ढल रही सांझ कोहरे से भर रही थी __आज तो कोई ख़बर हाथ नहीं लगी !...१९९० से पहले का दौर था ...वीपी सिंह की सरकार थी...चंद्रशेखर जी दाढी खुजला रहे थे ...! __मैनें रिपोर्टर से कहा _'पागल हो क्या ...जाओ बाहर सड़क की तरफ़ मुंह करके पांच मिनट खड़े रहो...थोडा दांयें - बांये भी मुंह घुमा लेना । '
लौटा तो _' बड़ा घना कोहरा है ...कुछ समझ नहीं आरहा ...तिलक ब्रिज दिख नहीं रहा ...दांयें ...इंडियन एक्सप्रेस ...धुंधले में हल्का सा लुपलुपा रहा है....'
बस्स ! इसी को लिख दो __वीपी सिंह ...देवीलाल ....चंद्रशेखर ...अरुण शौरी ...राजीव गाँधी ...आडवानी के नाम बीच - बीच में जोड़ते जाना !
'वीर अर्जुन ' की 'एंकर - स्टोरी ' बन गयी __हेडिंग बनी __उफ़ ...! ये घना कोहरा ! !
लपेटे शाल कोहरे का
दुबक कर सो रहा आकाश !
सातवें दशक के शुरुआती साल ... 'कादम्बिनी 'में प्रकाशित हुई थी यह कविता !... ' कादम्बिनी 'क्या !
एक जमाने में कोहरे को लेकर ये लाइनें _
मत कहो आकाश में कोहरा घना है !
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है !!
...भी खासी जुबान पर चढीं रहीं...और तरह - तरह लहजे और अर्थ देतीं रहीं _दुष्यंत कुमार का काव्य नए मुहावरे ढाल रहा था अपने दौर में ... !
अखबारों ...समाचारों ...में कोहरा सुर्खियों में है _एक वृतांत _
आइटीओ...बहादुरशाह जफ़र मार्ग ...ढल रही सांझ कोहरे से भर रही थी __आज तो कोई ख़बर हाथ नहीं लगी !...१९९० से पहले का दौर था ...वीपी सिंह की सरकार थी...चंद्रशेखर जी दाढी खुजला रहे थे ...! __मैनें रिपोर्टर से कहा _'पागल हो क्या ...जाओ बाहर सड़क की तरफ़ मुंह करके पांच मिनट खड़े रहो...थोडा दांयें - बांये भी मुंह घुमा लेना । '
लौटा तो _' बड़ा घना कोहरा है ...कुछ समझ नहीं आरहा ...तिलक ब्रिज दिख नहीं रहा ...दांयें ...इंडियन एक्सप्रेस ...धुंधले में हल्का सा लुपलुपा रहा है....'
बस्स ! इसी को लिख दो __वीपी सिंह ...देवीलाल ....चंद्रशेखर ...अरुण शौरी ...राजीव गाँधी ...आडवानी के नाम बीच - बीच में जोड़ते जाना !
'वीर अर्जुन ' की 'एंकर - स्टोरी ' बन गयी __हेडिंग बनी __उफ़ ...! ये घना कोहरा ! !
बुधवार, 31 दिसंबर 2008
एक कैलेंडर और पलटा !
एक कैलेंडर और पलटा...साल बदला ...कुछ नया ...कुछ बदलनें का हल्का - सा अहसास ...कुछ नए और अचीन्हें का भाव__दर्द और टीस का रेला पीछे छूटता हुआ...चमकते हुए कुछ तारे ...कुछ अव्यक्त सा !
अभी शोर है ...आतिशबाजी है...जोश और जांबाजी है ...सुबह तीखा सूरज निकलेगा ...आँखें चौधियायेंगी ...संयम और साहस का इम्तिहान होगा...बाजार,सरकार,समाज और सहकार सभी दांव पर हैं__अपनी भूमिका पहचान कर सबसे आँखे चार करना होगा __न डर कर ...न डरा कर __इंसानियत के दम पर हर शै से मुकाबला करना hogaa !
अभी शोर है ...आतिशबाजी है...जोश और जांबाजी है ...सुबह तीखा सूरज निकलेगा ...आँखें चौधियायेंगी ...संयम और साहस का इम्तिहान होगा...बाजार,सरकार,समाज और सहकार सभी दांव पर हैं__अपनी भूमिका पहचान कर सबसे आँखे चार करना होगा __न डर कर ...न डरा कर __इंसानियत के दम पर हर शै से मुकाबला करना hogaa !
रविवार, 21 दिसंबर 2008
ताज फ़िर हुआ रोशन !
आज... २१ दिसम्बर की शाम...ताज फ़िर रोशन हुआ __आतंक की कालिमा धोता हुआ __२६ - २७ -२८ नवम्बर की यादों के नक्श पोंछते हुए __शहर के गमजदा मिजाज में जिंदगी और जोश के नए रंग बिखेरते हुए __ताज फ़िर मुस्कुराया !
दर्द को सहलाना ...उसे गाना ...गाते - गाते नये जज्बे जगाना...जिंदगी के चलने का नाम है __मंजिलें और भी हैं ...आसमान और भी हैं ....जिन्दगी में सफर के मकाम और भी हैं !
__ये न समझें कि समूचे मुम्बई की धड़कन फकत ताज ही है...लेकिन फुटपाथ से लेकर आसमानी ऊँचाइयों पर जीने वाले मुम्बईकर के लिए ....आन - बान - शान ...तो ' ताज ' ही है ! __साहिर साहब ने ...' हम गरीबों का उडाया है मजाक ...' इस ताज के बारे में थोड़े लिखा था ...वो तो आगरा में है ! इस ताज पर तो हर मुम्बईकर को नाज है .
__शहर नए साल की ओर कदम बढ़ा रहा है...कड़वी यादें धुंधलायेंगी...नया सवेरा नई रंगत लाएगा !
दर्द को सहलाना ...उसे गाना ...गाते - गाते नये जज्बे जगाना...जिंदगी के चलने का नाम है __मंजिलें और भी हैं ...आसमान और भी हैं ....जिन्दगी में सफर के मकाम और भी हैं !
__ये न समझें कि समूचे मुम्बई की धड़कन फकत ताज ही है...लेकिन फुटपाथ से लेकर आसमानी ऊँचाइयों पर जीने वाले मुम्बईकर के लिए ....आन - बान - शान ...तो ' ताज ' ही है ! __साहिर साहब ने ...' हम गरीबों का उडाया है मजाक ...' इस ताज के बारे में थोड़े लिखा था ...वो तो आगरा में है ! इस ताज पर तो हर मुम्बईकर को नाज है .
__शहर नए साल की ओर कदम बढ़ा रहा है...कड़वी यादें धुंधलायेंगी...नया सवेरा नई रंगत लाएगा !
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