रविवार, 2 नवंबर 2008

कुंबले...कोटला...और गुड बॉय !

अनिल कुंबले ...पिछले एक-दो दिनों से यह नाम अखबारों-टीवी चैनलों ( खासकर चैनलों ) में खिंचाई और छींटाकसी का निशाना बना हुआ था __आज उछाल पर आ गया __आस्ट्रेलिया के साथ टेस्ट ड्रा होते ही कुंबले ने टेस्ट क्रिकेट से संन्यास घोषित कर दिया __१३२ टेस्ट...६१९ विकेट की शानदार उपलब्धि और डेल्ही के कोटला में ही पाकिस्तान के १० विकेट अकेले अपनी झोली में डालने के करिश्में की यादों के साथ वे अब सिर्फ़ क्रिकेट की रिकार्ड बुक में तेजस्वी सूर्य-सा चमकेंगे _वन-डे से वे पहले विदाई ले चुके हैं _आई सी एल में वे खेलेंगे ...और नागपुर वे ज़रूर जाएँगे ...गांगुली को विदाई देने । कहा जा रहा हैं कि...एक युग का अंत हो गया _जो आज था वो कल हो गया...जो आज है वो कल हो जायेगा ...और जो कल ...कल आयेगा ...ज़रूरी नहीं कि आप की उम्मीदों का ही कल हो _बेहतर है कि बीते कल का सम्मान कर ...और...जो आने वाले कल है ...उस पर इतमिनान कर .

कुम्बले...कोटला...गुड बॉय !


शनिवार, 11 अक्टूबर 2008

और एक दिन ...बंबई !


चलते -चलते एक दिन सारे नज़ारे बदले- बदले से लगने लगते हैं .लगता है जैसे ये हमारी दुनिया नहीं है._और जो दुनिया मिलती है उसे अपना मानना पड़ता है._जो सच है ,हकीक़त है वो तो है _जो बीता है ,वो बीता है _वो आज नहीं है._चलते-चलते बदलते जाना ही क्या जिन्दगी है?_क्या यही हकीकत है? _बड़ा कठिन है अतीत की गलियों से बहार निकल पाना ._किशोर वय के बाद के सिलसिले कब स्कूल के गलियारों से होते हुए कॉलेज और डिग्री कॉलेज के आँगन से बाहर निकाल _सन १९८० के दिसम्बर में तब की बंबई और आज की मुम्बई के नरीमन पॉइंट इलाके में खड़े _एक्सप्रेस टावर के दूसरे माले में _शरद जोशी _ के सामने खड़ा कर गए ...अहसास हुआ तो पाया_
टूटी सपनों की बैसाखियाँ तबीयत हो गयी हरी ।
....................जब से मिली बॉम्बे की नौकरी । ।
_पहली नौकरी थी _इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप ऑफ़ बॉम्बे की साप्ताहिक पत्रिका _हिन्दी एक्सप्रेस और पहले संपादक थे _शरद जोशी ... जानते हैं आप शरद जोशी को _ये प्याज़ वाला शरद जोशी नहीं है _ये ...ये जो है जिंदगी वाला शरद जोशी है...उन दिनों ...दो ही जोशी धूम पर थे _एक _मनोहर श्याम जोशी ...हम लोग वाले और दूसरे व्यंग वाले शरद जोशी । _उस दिन ट्रेन जब बॉम्बे के वी टी रेलवे स्टेशन पर पहुँच रही थी तो मेरे हाँथ मई जो अखबार था उसकी हेड लाइन थी _शरद जोशी गिरफ्तार _गिरफ्तार दरअसल प्याज़ वाले शरद जोशी हुए थे._

रविवार, 5 अक्टूबर 2008

परिवर्तन...

सब जानते हैं पर यकीन करना मुश्किल होता है कि चीजें इतनी तेजी से कैसे बदल जाती हैं। यादों के फीते से नापने पर तो ऐसा लगता है जैसे सब अभी-अभी ही तो चल रहा था___फासला इतना कैसे हो गया। ऐसा ही होता है._जिस रामलीला के आनंद सागर में बालमन और बालपन कुलांचें भर रहा था वो कब _लक्ष्मण से परशुराम की भूमिका में आ गया पता ही नहीं चला । _पिता के सामने जिस भूमिका में उनसे तकरार होती थी अब वही परसुराम की भूमिका स्वयं करने की चुनौती सामने आयी। _लक्ष्मण के रोल के बाद _ मेघनाथ ,परशुराम आदि की भूमिका रामलीला मई कीं._पिता जी के रोल होते थे _दशरथ ,परशुराम,बाली,अंगद ,सुतीक्षण आदि._वैसे तो रामलीला का चैलेन्ज कुछ एइसा होता है कि कब आपको क्या न बनना पड़ जाए_एक बार मुझे तो सूर्पनखा बनना पड़ा _हुआ ये कि जिसे सूर्पनखा बनना था पहले उन्हें मारीच बनना था और वो मारीच के रोल के लिए जोकरों वाले कपड़े पहनने की जिद कर रहे थे ,जिद पुरी नहीं हुई तो गोल हो गए._फ़िर क्या बने सूर्पनखा । _ लक्ष्मन आदि की भूमिका तो बड़े मासूम मन की होतीं हैं _चारो तरफ़ ...सौंदर्य,वैभव,आत्मीयता ,श्रद्धा का भावः होता है। एक लय जैसे होती है_आप अपने आप में नहीं होते ,आप जहाँ होते हैं ...जिस पात्र में होते हैं उसी में लीन होते हैं_ऐसे में कोई विचार ही नहीं उपजता _सर पर सोने का ताज हो ,राजाओं से लिबास और इतना सारा प्यार और सत्कार और क्या चाहिए .__सच जीवन मे इसके बाद और कुछ चाहने की जरुरत ही महसूस हुई ._सब कुछ चाहने पहले ही मिलता चला गया .

सोमवार, 29 सितंबर 2008

धनुष यज्ञ.

तेहिं क्षन राम मध्य धनुष तोरा ..
धनुष राम तोड़ते हैं._परसुराम आते हैं_चरों ओर हाहाकार मच जाताहै।
कहो जनक क्या कारन है,भारी भीड़ भाड़ क्यों है _
अभी शोर -सा कैसा था,अब वीरों मे छेडछाड़ क्यों है ?
जनक के कारन बताने पर परसुराम को भारी क्रोध आता है _
ऐ जनक बता तू शीघ्र मुझे ,यह धनुहा किसने तोडा है
किसने इस भरे स्वयंवर में सीता से नाता जोड़ा है
इसीबीच राम _नाथ शम्भू धनु भंजन हारा,होइहैं कोऊ इक दास तुम्हारा _कहकर परसुराम को प्रणाम करते हैं पर परसुराम जी आवेष मे कहते हैं _
सुनो राम सेवक वो है ,जिसका सेवा पर ही चित है
बैरी का जो काम करे,वो काट डालने काबिल है
_सुनहु राम जो शिव धनु तोरा सहसबाहु सम सो रिपु मोरा...
_सो बिलगाई विहाय समाजा नतु मारे जैहैं सब राजा
लक्षमण की शरारत से परसुराम का गुस्सा भड़क जाता है वे _
देख ओ रजा के लड़के ,तू मुह को नहीं सभालता है
मुझ जैसे क्रोधी के सामने ,क्यों आखें लाल निकलता है
श्री महादेव का महा धनुष ,जो पुरी पृथ्वी मैं जलहर है
इतना बड़ा प्रचंड चाँद यूं ही धनुहीं के समदर है
_तकरार तेज होती है _
_अरे नादान बालक तू कौन है ?
_सारा ब्रम्हांड सर पर धरे तू कौन है?
_ मैं छतरियों का काल हूँ
_तो मैं शास्स्त्रशाल हूँ
_अभी तू नादान बालक सुकुमार है
_नहीं ये बालक वीर रघुवंश कुमार है
_दूध मुहे बड़ों से हंसी छोड़ ,यह हंसना तुझे रुलाएगा
कर देगा दांत अभी खट्टे ,फरसा ओह स्वाद चाखायेगा
लड़के महलों मैं खेल -खेल क्योँ मुझसे लड़ के मरता है
मेरी क्रोधानल के आगे, किसलिए लड़कपन करता है
_राम की विनम्रता और एक बार काल से भी लड़ने की ललकार के बाद परसुराम राम के प्रति अपना आदर भाव व्यक्त करते हैं _राम रमापति कर धनु लेहु ,खैंचहु चाप मिटे संदेहू ....
__कर्वी की यह रामलीला लगभग १५०-सालों से उपर का सफर कर रही है._पहले तो परिवार मैं यह होता था की रामलीला अवसर पर सबलोग शामिल होते थे पर अब कहाँ ....जानें कहाँ गए वो दिन __ये जो यादें मैं आप से जी रहा हूँ ये लगभग ४०-४५ साल पहले यानि सन ६०-६५ के दौर की बातें हैं
__कर्वी की रामलीला अनुथानिक और संवाद प्रधान होती थी। दसहरा को रावण बध आगे कुछ दिन बाद राम की राजगद्दी । आगे के प्रसंग नहीं उठाते ...राजगद्दी के बाद नाटकों का सिलसिला चलता है । उस दौर मैं हमलोग वीर अर्जुन और कृष्णावतार [राधेश्याम कथावाचक के ] जरुर खेलते थे। रामलीला मैं राम,सीता के प्रात्र तो बच्चे [१३-१४ साल तक] ही निभाते और महिला पात्रों काम पुरूष करते.





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शनिवार, 27 सितंबर 2008

थोड़ा कुछ अपने बारे में...

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर आलोकित चित्रकूट से कोई सात किलोमीटर उत्तर एक छोटा-सा क़स्बा _कर्वी नाम से है _जो अब _ चित्रकूट धाम कर्वी के नाम से जाना जाता है ._यही छोटा-सा क़स्बा कर्वी अपने बालमन और बालपन की क्रीडा भूमि रही और जो पहला प्ले-ग्राउंड मिला वो __रामलीला का ही था._शुरूआती दिनों शत्रुघ्न की भूमिका मिली बाद में लक्ष्मन की ._आलम यह था कि... धनुषयज्ञ की लीला में पिताजी [पुरुषोत्तम लाल रिछारिया] परशुराम की भूमिका में होते और ग्रैंड-फादर [पं प्यारेलाल रिछारिया ]_पेटुराजा के चरित्र में _क्या गजब का रूपक सजता _जबकि लिहाजन हम लोग शायद कभी-कभी ही आमने- सामने पड़ते हों ._उत्तर भारत के परिवारों में तब के दौर के बाप-बेटे के बीच संवाद के अवसर कम ही आते थे और पिता तो अपने पिता के सामने अपने बेटे से कम ही लाड-प्यार जताते थे । अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि _कैसा होता रहा होगा परसुराम लक्ष्मन संवाद ._चौदस की रात होती है धनुष यज्ञ की लीला कर्वी में .
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शुक्रवार, 26 सितंबर 2008

यादों के सिलसिले...

यादों के सिलसिलों के मुहाने पर अपने होंने का अहसास _ यह अहसास भी अपने आप में अजब-सा अहसास है_अजब -सी दस्तक_ अजब-सा खुमार_कोई नाम है इस अहसास का या सब अनाम है__

नाम_ टिल्लन [ जो कानों ने सुना] जो आंखों ने देखा _ शिव शम्भू दयाल रिछारिया । आसपास जो आबोहवा और खनक थी उसमें _रंग, राग,रस,कवित्त,संगीत और रामलीला का खासा असर था जो अपने ऊपर भी छाता चला गया._जब कारवां आगे बढा तो ये ही सब जीवन के सफर में पतवार बने और जीवन का आधार भी.

गुरुवार, 25 सितंबर 2008

चित्रकूट घाट पर...

चित्रकूट के घाट पर इन दिनों संतों के मेलों और संगतों के आलावा रामलीलाओं की भी खासी धूम मची है .देश _खासकर उत्तर भारत मैं इन दिनों पितृ-पक्ष के उतरते-उतरते रामलीलाओं का शुभारम्भ हो जाता है._मेरे लिए ये दौर यादों का ज्वार लेकर आता है._जबसे कुछ भी याद है तो याद के रूप जो पहली याद है वो है रामलीला के शुरूआती दिन_ताडका-बध के लिए मुनि विश्वामित्र राजा दशरथ से राम और लक्ष्मन को मँगाने आए हैं और दशरथ मना कर रहे हैं_
--मांगिये मुनिराज यज्ञ रक्षा के काज
चाहे सेना गज बाज चाहे धन धाम को
खाडे शमशीर वीर बांके रणवीर धीर
योधा सुगम्भीर खल दल के संग्राम को
आप से दयानिधान इतना ही मांगता हूँ

मांगो जो हो मांगना पर न मांगो रामचंद्र को
दशकों पहले की ये बातें आज भी बीते कल तरह ताजा हैं और ताजा हैं वो सारे दृश्य और वे अनुभूतियाँ जो मेरी अपनी जिन्दगी के सफर का आगाज बने.

रविवार, 21 सितंबर 2008

पहली नजर

आधी छोड़ पूरी को धावे, पूरी मिले न आधी पावे।