शुक्रवार, 26 सितंबर 2008

यादों के सिलसिले...

यादों के सिलसिलों के मुहाने पर अपने होंने का अहसास _ यह अहसास भी अपने आप में अजब-सा अहसास है_अजब -सी दस्तक_ अजब-सा खुमार_कोई नाम है इस अहसास का या सब अनाम है__

नाम_ टिल्लन [ जो कानों ने सुना] जो आंखों ने देखा _ शिव शम्भू दयाल रिछारिया । आसपास जो आबोहवा और खनक थी उसमें _रंग, राग,रस,कवित्त,संगीत और रामलीला का खासा असर था जो अपने ऊपर भी छाता चला गया._जब कारवां आगे बढा तो ये ही सब जीवन के सफर में पतवार बने और जीवन का आधार भी.

गुरुवार, 25 सितंबर 2008

चित्रकूट घाट पर...

चित्रकूट के घाट पर इन दिनों संतों के मेलों और संगतों के आलावा रामलीलाओं की भी खासी धूम मची है .देश _खासकर उत्तर भारत मैं इन दिनों पितृ-पक्ष के उतरते-उतरते रामलीलाओं का शुभारम्भ हो जाता है._मेरे लिए ये दौर यादों का ज्वार लेकर आता है._जबसे कुछ भी याद है तो याद के रूप जो पहली याद है वो है रामलीला के शुरूआती दिन_ताडका-बध के लिए मुनि विश्वामित्र राजा दशरथ से राम और लक्ष्मन को मँगाने आए हैं और दशरथ मना कर रहे हैं_
--मांगिये मुनिराज यज्ञ रक्षा के काज
चाहे सेना गज बाज चाहे धन धाम को
खाडे शमशीर वीर बांके रणवीर धीर
योधा सुगम्भीर खल दल के संग्राम को
आप से दयानिधान इतना ही मांगता हूँ

मांगो जो हो मांगना पर न मांगो रामचंद्र को
दशकों पहले की ये बातें आज भी बीते कल तरह ताजा हैं और ताजा हैं वो सारे दृश्य और वे अनुभूतियाँ जो मेरी अपनी जिन्दगी के सफर का आगाज बने.

रविवार, 21 सितंबर 2008

पहली नजर

आधी छोड़ पूरी को धावे, पूरी मिले न आधी पावे।