गुरुवार, 20 मई 2010

महानता : सन्दर्भ सचिन...


महानता सिर्फ एक बार का हासिल नहीं . यह निरंतर चलने वाली एक प्रक्रिया है !...सन्दर्भ : सचिन तेंदुलकर ! कल मैंने अपने आप से कहा था ... ' बड़ा बनाना है तो अपने आप से बड़ा बनो ' '...और कभी भी अपने आप से बड़ा दिखने की कोशिश मत करो ' ...महानता दिखनी नहीं , महसूस होनी चाहिए !

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

बांदा के राजू उर्फ़ ' नटवर का चौमासा '

राजू मिश्र उर्फ़ ( बांदा की पत्रकारिता का ) नटवर लाल !...सन १९७२-७३-७४-७५ के सालों वाला बांदा !...उत्तर प्रदेश का साधारण सा एक जिला ... तब इसी जिले में शुमार होते थे ...चित्रकूट...राजापुर ( तुलसी दास का जन्मस्थान )...अब चित्रकूट खुद जिला बन गया है । इतिहास की तमाम करवटों के बीच हम पकड़ते हैं पिछली सदी के आख़री तीस साल !!

१९७०-७१-७२ का बांदा ...कवि केदार का बांदा ...चारो ओर धूम थी कवि केदार की !...कवि केदार कितने बड़े कवि थे ...ये तब हमलोग नहीं जानते थे ...हाँ इतना जरूर समझते थे कि जब इनसे इतने बड़े - बड़े कवि लोग मिलने आते हैं तो ये भी उतने बड़े तो होंगे ही ।...बाबा नागार्जुन , हरिवंश रॉय बच्चन , अमृत रॉय ...
बांदा में कवि केदार की अगुआई में तब ' प्रगतिशील सम्मलेन ' हो चुका था ...देश भर के तमाम साहित्य प्रेमी बांदा की मिट्टी के आतिथ्य का स्वाद ले चुके थे । कविता का एक नया तेवर अवतार ले चुका था ....कवि केदार के ओजस्वी व्यक्तित्व का असर समाज की सभी इकाइयों पर पडा । ...पत्रकारिता पर भी भरपूर असर पडा । कसबे के ...मध्ययुग , बम्बार्ड , विश्व प्रभाकर ...जैसे अखबारों में अक्स दिखने लगा ...और विकसित होने लगी पत्रकारिता में नयी पौध ...जन-चेतना की धार ...इसी धार और रफ़्तार से हम जैसे तमाम निकले ....! राजू मिश्र बांदा की इसी दौर की उपज हैं । ...बहुत घिसे गए ...बहुत रगड़े गए...बहुत तराशे गए ...जेब में छदाम नहीं लेकिन रुका कोई काम नहीं ...!
ये दौर ' रविवार '...' दिनमान ' ...' धर्मयुग ' जैसी पत्रिकाओं का उत्कर्ष काल था । ...जागरण,आज,भारत और बाद के दौर का...अमृत प्रभात इलाके के प्रभावी अखबार थे । ...कवि गोष्ठी वाले हमलोग पत्रकारों के लिए दोयम दर्जे के लोग हुआ करते थे ...टाइम्स ऑफ़ इंडिया के ...बी डी गुप्ता की तूती बोलती थी । ...ए के सहगल और रामेश्वर गुप्ता का एक धडा था ....हम लोग संतोष दादा गैंग के थे...हर जगह पिले रहते थे ...बम्बार्ड के विक्रमादित्य का खासा रुतबा था ....बड़ा चक्रव्यूह था ...लेकिन इसमें कोई अभिमन्यु कभी मारा गया ...क्योंकि यहाँ की महाभारत के भीष्म और कृष्ण की मुखर भूमिका में हमेशा कवि केदार हमेशा तत्पर रहे .

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2009

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शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

जीने के कुछ और बहाने खोज !

ये सब मुसाफिर हैं !

मौसम कुनकुना है ...दरख्तों पर कोंपलें फूट रहीं हैं , धूप चटख और हवाएं कभी खुश्क तो कभी नरम-नरम . प्रकृति रंग बदल रही है __ऐसा ही बदलाव कुछ अंतर मेंभी हो रहा है__ वैसे आज के इस दौर में इस तरह के बदलावों के कुछ मायनें होते नहीं हैं __पता नहीं किस दौर के आदमी हैं आप ! अपनें इर्द -गिर्द देखिये बहुत तो सर पर पैर धरे और कोई तो किसी और के सर पर पैर धरे भाग रहा है __

भगा जा रहा हूँ
भगा जा रहा हूँ
नहीं जानता हूँ ...
कहाँ जा रहा हूँ !

अपनीं रौ है ...
और अपना रास्ता
औरों से अपना क्या वास्ता !!

जीवन के सफ़र में वफ़ा और वेवफा दोनों तरह के मुसाफिर मिलेंगे __जनाब जब जानते हैं कि ....ये सब मुसाफिर हैं और ...आलय हो या कार्यालय ...मुसाफिरखाना हैं ...तो फिर इनसे राग और अनुराग कैसा !__बस उतना ही उपकार समझ ले जो जितना साथ निभा दे !! मन को साकार खूंटे से खोलकर निराकार के खूटें से बांधें ....वैसे बहुत बेहतर है ' मन को पिंजडे में न डालें और मन का कहना भी न टालें !

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009