मंगलवार, 20 जनवरी 2009

सोमवार, 5 जनवरी 2009

कोहरे की गिरफ्त !


लपेटे शाल कोहरे का...!

सुबह और शाम कोहरे का आलम है ...जन - जीवन , रहन - सहन , खान - पान ...सब बदला - बदला सा है _अजब - सी खुमारी है...अजब सा हाल है दिल - दिमाग का _

लपेटे शाल कोहरे का
दुबक कर सो रहा आकाश !

सातवें दशक के शुरुआती साल ... 'कादम्बिनी 'में प्रकाशित हुई थी यह कविता !... ' कादम्बिनी 'क्या !

एक जमाने में कोहरे को लेकर ये लाइनें _

मत कहो आकाश में कोहरा घना है !
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है !!

...भी खासी जुबान पर चढीं रहीं...और तरह - तरह लहजे और अर्थ देतीं रहीं _दुष्यंत कुमार का काव्य नए मुहावरे ढाल रहा था अपने दौर में ... !

अखबारों ...समाचारों ...में कोहरा सुर्खियों में है _एक वृतांत _

आइटीओ...बहादुरशाह जफ़र मार्ग ...ढल रही सांझ कोहरे से भर रही थी __आज तो कोई ख़बर हाथ नहीं लगी !...१९९० से पहले का दौर था ...वीपी सिंह की सरकार थी...चंद्रशेखर जी दाढी खुजला रहे थे ...! __मैनें रिपोर्टर से कहा _'पागल हो क्या ...जाओ बाहर सड़क की तरफ़ मुंह करके पांच मिनट खड़े रहो...थोडा दांयें - बांये भी मुंह घुमा लेना । '

लौटा तो _' बड़ा घना कोहरा है ...कुछ समझ नहीं आरहा ...तिलक ब्रिज दिख नहीं रहा ...दांयें ...इंडियन एक्सप्रेस ...धुंधले में हल्का सा लुपलुपा रहा है....'

बस्स ! इसी को लिख दो __वीपी सिंह ...देवीलाल ....चंद्रशेखर ...अरुण शौरी ...राजीव गाँधी ...आडवानी के नाम बीच - बीच में जोड़ते जाना !

'वीर अर्जुन ' की 'एंकर - स्टोरी ' बन गयी __हेडिंग बनी __उफ़ ...! ये घना कोहरा ! !

जिंदगी के रंग !


बुधवार, 31 दिसंबर 2008

एक कैलेंडर और पलटा !

एक कैलेंडर और पलटा...साल बदला ...कुछ नया ...कुछ बदलनें का हल्का - सा अहसास ...कुछ नए और अचीन्हें का भाव__दर्द और टीस का रेला पीछे छूटता हुआ...चमकते हुए कुछ तारे ...कुछ अव्यक्त सा !
अभी शोर है ...आतिशबाजी है...जोश और जांबाजी है ...सुबह तीखा सूरज निकलेगा ...आँखें चौधियायेंगी ...संयम और साहस का इम्तिहान होगा...बाजार,सरकार,समाज और सहकार सभी दांव पर हैं__अपनी भूमिका पहचान कर सबसे आँखे चार करना होगा __न डर कर ...न डरा कर __इंसानियत के दम पर हर शै से मुकाबला करना hogaa !

नई यात्रा पर !

पार्टी टाइम !

न्यू इयर..!

विदा २००८ !



स्वागत २००९ !

रविवार, 21 दिसंबर 2008

ताज फ़िर हुआ रोशन !

आज... २१ दिसम्बर की शाम...ताज फ़िर रोशन हुआ __आतंक की कालिमा धोता हुआ __२६ - २७ -२८ नवम्बर की यादों के नक्श पोंछते हुए __शहर के गमजदा मिजाज में जिंदगी और जोश के नए रंग बिखेरते हुए __ताज फ़िर मुस्कुराया !
दर्द को सहलाना ...उसे गाना ...गाते - गाते नये जज्बे जगाना...जिंदगी के चलने का नाम है __मंजिलें और भी हैं ...आसमान और भी हैं ....जिन्दगी में सफर के मकाम और भी हैं !
__ये न समझें कि समूचे मुम्बई की धड़कन फकत ताज ही है...लेकिन फुटपाथ से लेकर आसमानी ऊँचाइयों पर जीने वाले मुम्बईकर के लिए ....आन - बान - शान ...तो ' ताज ' ही है ! __साहिर साहब ने ...' हम गरीबों का उडाया है मजाक ...' इस ताज के बारे में थोड़े लिखा था ...वो तो आगरा में है ! इस ताज पर तो हर मुम्बईकर को नाज है .
__शहर नए साल की ओर कदम बढ़ा रहा है...कड़वी यादें धुंधलायेंगी...नया सवेरा नई रंगत लाएगा !

अमिताभ जी !

December 21st, 2008 at 2:42 pm

अमिताभ जी !
आज आप स्मृतियों में बहुत गहरे ‘ माता जी ‘ के पास होंगे __यों तो हर दिन उनकी यादों के बिना नहीं बीतता होगा …पर आज यादें कुछ ज्यादा ही घनीभूत होंगी __आज सुबह अखबारों में ‘ तस्वीर ‘ देखी तो स्मृतियाँ कौंध गयीं __जब कर्वी ( चित्रकूट ) में रहते थे तो अक्सर सुनते थे कि…तेजी जी आयीं थीं …चित्रकूट…जानकीकुंड में …पंजाबी बाबा के यहाँ गयीं .__बांदा…के नाते आप और आपके परिवार से यह इलाका सहज अपनापा मानता है __बच्चन जी से बांदा में एक - दो मुलाकातें याद हैं __तब …१९७१-७२ में ग़ेजुएशन के दौरान बच्चन जी के दशर्न प्राप्त हुए

__कविता प्रतियोगिता में अपने को भी बच्चन जी से पुरस्कार मिला __कविता की किताब थी ...बाद में और प्रत्याशी किताब में उनके आटोग्राफ लेने लगे …दोस्तों ने मुझे भी कहा __मैंने कहा…’ मैनें स्मृतियों में आटोग्राफ ले लिया है ! ‘ बांदा में अक्सर केदार बाबू ( केदारनाथ अग्रवाल ) के सौजन्य से बच्चन जी के सहज …अति सहज रूप के दशर्न मिलते रहे …छवियाँ स्मृतियों में दर्ज होती रहीं ….जो अभी भी कल की बातें लगतीं हैं __तेजी जी को सीधे - सीधे कहाँ देखा …याद नहीं ….हो सकता है कि ना भी देखा हो और स्मृतियों के विम्ब इतने सघन हों कि यथार्थ को भी मात दे रहें हों !

__अमित जी ये ही स्मृतियाँ सत्य हैं …शेष सब निस्सार है __राम - कृष्ण - सीता - मीरा को न हमने देखा न आपने …सिर्फ़ स्मृतियों का पुल ही तो है जो हमें उनसे जोड़ता है …अविभाज्य बनाता है ! बच्चन जी …तेजी जी …सांसारिक रूप से बेशक अमिताभ बच्चन के माता - पिता हैं ….पर स्मृतियों के लोक में किसके क्या - क्या नहीं !

__आपको रेडियो में दिया अपना एक इन्टरव्यू याद होगा जिसमें आपने जिक्र किया था किहो सकता है कि यथार्थ में आप अपने पिताश्री की मृत्यु पर …न रो पाऊं ….क्योंकि वह आप कहीं व्यक्त कर चुके हैं …. पूरा इन्टरव्यू अभी भी मुझे याद है !

__समय के प्रवाह में स्थूल तो बह जाता है…सत्व ….स्मृतियों में हमेशा अमर रहता है !

__ आज न जाने क्यों….आपसे अपनापा फूट रहा है….मिले …एक या दो बार __ वीर अर्जुन के ….अनिल नरेंद्र की बेटी के शादी में….सन…रहा होगा…१९९३-९४ ….तब आपसे गपशप भी हुयी थी , बेटी श्वेता भी थी आपके saath ….बम्बई में तो आपके घर…प्रती क्षा के सामने से अक्सर गुजरते थे …जुहू जाते समय …एक बार घर भी गए थे….डॉ रामकुमार वर्मा का पत्र लेकर …जाया जी मिलीं __तब मैं __धर्मयुग में तह…१९८०से ८७ तक बम्बई रहा….हिन्दी एक्सप्रेस (शरद जोशी ) करंट ( डॉ.महावीर अधिकारी)…आपको जब कुली का दौरान जब चोट लगी तो करंट में
था …धर्मयुग में भारती जी के साथ का साल था __१९८४-८५ …!

__परिवार में सभी को यथायोग्य !

सादर __टिल्लन रिछारिया !

मंगलवार, 16 दिसंबर 2008

बंबई ...सुबह चार बजे !

इलाका भुलेश्वर का ...सुबह से गुलजार...सुबह...यानी चार-सादे-चार बजे ! घड़ी-घंटों और शंख घ्वनि की गूंज...सुबह से बम्बई शुरू...झटके से उठिए वरना नल चला जाएगा ...नल तो वहीं रहेगा पानी चला जाएगा...बिना नहाये मन्दिर मैं गुजारा कैसे !__बंबई मैं तो हर चीज के लिए लाइन लगती है...यह बात समझ में आ चुकी है कि लाइन में लगे बिना यहाँ कुछ भी पाना कितना मुश्किल है...पहला चरण पूरा...दूसरे में हनुमान जी को हाजिरी...अब सवारी सड़क पर है...घंटों की टन-टन और महमहाते फूलों की खुशबू से भरी फूलवाली गली से गुजर गुजर कर अब सवारी सड़क पर है ...खान-पान की दूकानें खुल चुकी हैं...गरमागरम दूध और ताजी जलेबियाँ ...वादा पाव...आलू-पूरी...और तरह-तरह के स्वाद आपकी राह छेंकने की भरपूर कोशिश कर रहे hain ...पर क्या मजाल कि आपका दिल मचल जाए__मंगलवार और शनिवार तो हनुमान जी की कृपा से प्रसाद स्वरूप इतना मिष्ठान मिलता है कि फ़िर मन ही न करे और रोज...आज अभी भी तो हनुमान जी ने प्रसाद में बरफी दी है...हाँ...कुछ फरसाण हो जाए तो बात अलग है __बम्बई में नमकीन-तत्व को फरसाण बोलते हैं__हाँ...हनुमान जी मिठाई तो खिलाते थे पर मेहनत भी करवाते थे__चढावे में जो रुपये-पैसे चढ़ते ...उन्हें ....रूपये-आठ आने-चार आने और दस पैसे ...अलग-अलग करने होते....तो मंगल और शनिवार को कभी कतराते तो कभी अपने को दांव पर लगा ...मुद्रा निस्तारण कार्य सम्पन्न कर हनुमान जी और महंत जी का आर्शीवाद पाते ! __कभी ऐसा भी हुआ कि जब डेढ़ - दो रूपये बचे तो तुरत हनुमान जी को समर्पित कर देते ....इस आगाह के साथ कि अब आप ही सभालना ___और...घंटे-दो-घंटे में ...भाई साहबनुमा कोई ऐसा शख्श आता जो खूब खिलाता-पिलाता ( पिलाता को कुछ और पीना...पिलाना न समझें ) और जाते-जाते तीन बार पूछता ....और सब टीक हैं ना __अगर चेहरे पर जरा भी चाहत दिखाई दी तो __बीस-पचास की प्राप्ती अलग होती थी__तबके बीस रूपये का मतलब समझते हैं आप__तब बस का न्यूनतम टिकट 30 पैसे और लोकल ट्रेन का 25 था__तीन- साढ़े-तीन में बढिया भोजन और इतने मी ही सिनेमा का टिकट...फस्ट क्लास का....लोकल का पास हो और जेब में दो रूपये ....राजाबाबू बन घूमों बम्बई...! तब बीस-पच्चास की वकत hotee thee ....सात सौ तो तनख्वाह थी अपनी तब ... फ़ोर फीगर सैलरी का के सम्मान का ज़माना था ___मैंभी कहाँ चिल्लरों के चक्कर उलझ गया___वैसे खेल तो सब इन्हीं चिल्लरों के लिए हैं ! __बिन चिल्लर सब सून__सोचा था कि आपको आज अपने रास्ते से ....एक्सप्रेस टावर ले चलूँगा ....पर अब आज रहने देते हैं __कल चलिएगा ....थोडा फुर्त्ती से तैयार होइएगा !!!!!